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Thursday, March 17, 2016

सोनाखान, सोनचिरइया और सुनहला छत्तीसगढ़

'अमीर धरती के गरीब लोग' जुमला वाले छत्तीसगढ़ का सोनाखान, अब तक मिथक-सा माना जा रहा, सचमुच सोने की खान साबित हुआ है। पिछले दिनों सोनाखान के बाघमड़ा (या बाघमारा) क्षेत्र की सफल ई-नीलामी से छत्तीसगढ़, गोल्ड कंपोजिट लाइसेंस की नीलामी करने वाला पहला राज्य बन गया है। बलौदाबाजार जिले के सोने की खान, बाघमड़ा क्षेत्र 608 हेक्टेयर में फैला है और आंकलन है कि यहां लगभग 2700 किलो स्वर्ण भंडार है। इस क्षेत्र का एक्सप्लोरेशन 1981 में आरंभ किया गया था और मध्य भारत के इस महत्वपूर्ण और पुराने पूर्वेक्षित क्षेत्र के साथ, अधिकृत जानकारी के अनुसार, रोचक यह भी कि इस क्षेत्र में प्राचीन खनन के चिह्न पाए गए हैं। इसके अलावा मुख्यतः कांकेर, महासमुंद और राजनांदगांव जिला भी स्वर्ण संभावनायुक्त है।
बाघमड़ा (या बाघमारा) गांव के पास की पहाड़ी की वह छोटी गुफा,
जिसे स्‍थानीय लोग बाघ बिला यानि बाघ का बिल या निवास कहते है,
माना जाता है कि इसी के आधार पर गांव का नाम बाघमड़ा पड़ा है.
चित्र सौजन्‍य- डॉ. के पी वर्मा
इस सिलसिले में छत्तीसगढ़ के कुछ महत्वपूर्ण स्वर्ण-संदर्भों को याद करें। मल्हार में ढाई दिन तक हुई सोने की बरसात से ले कर बालपुर में पूरी दुनिया के ढाई दिन के राशन खर्च के बराबर सोना भू-गर्भ में होने की कहानियां हैं। दुर्ग जिले में एक गांव सोनचिरइया है तो सोन, सोनसरी, सोनादुला, सोनाडीह, सोनतरई, सोनबरसा जैसे एकाधिक और करीब एक-एक दर्जन सोनपुर और सोनपुरी नाम वाले गांव राज्य में हैं। कुछ अन्य नाम सोनसरार, सोनक्यारी हैं, जिनसे स्वर्ण-कणों की उपलब्धता वाली पट्‌टी का अर्थ ध्वनित होता है और दुर्गुकोंदल का गांव सोनझरियापारा भी है, जिसका स्पष्ट आशय सोनझरा समुदाय की बसाहट का है। छत्तीसगढ़ के सोनझरा, अपने सूत्र बालाघाट और उड़ीसा से जोड़ते हैं। एक दंतकथा प्रचलित है, जिसमें कहा जाता है कि पार्वती के मुकुट का सोना, इन सोनझरों के कारण नदी में गिर गया था, फलस्वरूप इनकी नियति उसी सोने को खोजते जीवन-यापन की है। जोशुआ प्रोजेक्ट ने छत्तीसगढ़ निवासियों को कुल 465 जाति-वर्ग में बांटा है। इसी स्रोत में देश की कुल सोनझरा जनसंख्यार 17000 में से सर्वाधिक उड़ीसा में 14000, महाराष्ट्र। में 1500, मध्यप्रदेश में 400 और छत्तीसगढ़ में 700 बताई गई है।
सुनहली महानदी 
चित्र सौजन्‍य- श्री अमर मुलवानी
मुख्यतः रायगढ़ और जशपुर के रहवासी इन सोनझरों का काम रेत से तेल निकालने सा असंभव नहीं तो नदी-नालों और उसके आसपास की रेतीली मिट्‌टी को धो-धो कर सोने के कण निकाल लेने वाला श्रमसाध्य जरूर है। इन्हें महानदी के किनारे खास कर मांद संगम चन्दरपुर और महानदी की सहायक ईब व अन्ये सहायक जलधाराओं के किनारे अपने काम में तल्लीन देखा जा सकता है। इन्द्रावती नदी में बाढ़ का पानी उतरने के बाद झिलमिल सुनहरी रेत देख कर इनकी आंखों में चमक आ जाती है। इन्हें शहरी और कस्बाई सराफा इलाकों की नाली में भी अपने काम में जुटे देखा जा सकता है।
सोनझरा महिला के कठौते में सोने के चमकते कण
चित्र सौजन्‍य- श्री जे आर भगत
सोना झारने यानि धोने के लिए सोनझरा छिछला, अवतल अलग-अलग आकार का कठौता इस्तेमाल करते हैं। इनका पारंपरिक तरीका है कि जलधाराओं के आसपास की तीन कठौता मिट्‌टी ले कर स्वर्ण-कण मिलने की संभावना तलाश करते हैं, इस क्रम में सुनहरी-पट्‌टी मिलते ही सोना झारते, रास्तेभ में आने वाली मुश्किलों को नजरअंदाज करते, आगे बढ़ने लगते हैं। ऐसी मिट्‌टी को पानी से धोते-धोते मिट्‌टी घुल कर बहती जाती है और यह प्रक्रिया दुहराते हुए अंत में सोने के चमकीले कण अलग हो जाते हैं।

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मिथक-कथाएं, अक्सर बेहतर हकीकत बयां करती हैं, कभी सच बोलने के लिए मददगार बनती हैं, सच के पहलुओं को खोलने में सहायक तो सदैव होती हैं। वैदिक-पौराणिक एक कथा है राजा पृथु वाली और दूसरी, मयूरध्वज की। पृथु को प्रथम अभिषिक्त राजा कहा गया है, यह भी उल्लेख मिलता है कि इसका अभिषेक दंडकारण्य में हुआ था। यह पारम्परिक लोकगाथाओं से भी प्रमाण-पुष्ट हो कर सच बन जाता है, जब देवार गायक गीत गाते हैं- ''रइया के सिरजे रइया रतनपुर। राजा बेनू के सिरजे मलार।'' यानि राजा (आदि राजा- पृथु?) ने रतनपुर राज्य की स्थापना की, लेकिन मल्हार उससे भी पुराना उसके पूर्वज राजा वेन द्वारा सिरजा गया है।

पृथु की कथा से पता लगता है कि उसने भूमि को कन्या मानकर उसका पोषण (दोहन) किया, इसी से हमारे ग्रह का नाम पृथ्वी हुआ। वह भूमि को समतल करने वाला पहला व्यक्ति था, उसने कृषि, अन्नादि उपजाने की शुरूआत करा कर संस्कृति और सभ्यता के नये युग का सूत्रपात किया। इसी दौर में जंगल कटवाये गए। कहा जाता है कि सभ्यता का आरंभ उस दिन हुआ, जिस दिन पहला पेड़ कटा (छत्तीसगढ़ी में बसाहट की शुरुआत के लिए 'भरुहा काटना' मुहावरा है, बनारस के बनकटी महाबीरजी और गोरखपुर में बनकटा ग्राम नाम जैसे कई उदाहरण हैं।) और यह भी कहा जाता है कि पर्यावरण का संकट आरे के इस्तेमाल के साथ शुरू हुआ।

बहरहाल, एक कथा में गाय रूप धारण की हुई पृथ्वी की प्रार्थना मान कर, उसके शिकार के बजाय पृथु ने उसका दोहन किया, (मानों मुर्गी के बजाय अंडों से काम चलाने को राजी हुआ)। भागवत की कथा में पृथु ने पृथ्वी के गर्भ में छिपी हुई सकल औषधि, धान्य, रस, रत्न सहित स्वर्णादि धातु प्राप्त करने की कला का बोध कराया। राजकाज के रूपक की सर्वकालिक संभावना वाली इस कथा पर जगदीशचन्द्र माथुर ने 'पहला राजा' नाटक रचा है।

मयूरध्वज की कथा जैमिनी अश्वइमेध के अलावा अन्य ग्रंथों में भी थोड़े फेरबदल से आई है। कथा की राजधानी का नाम साम्य, छत्तीसगढ़ यानि प्राचीन दक्षिण कोसल की राजधानी रत्नपुर से है और अश्वमेध के कृष्णार्जुन के युद्ध प्रसंग की स्मृति भी वर्तमान रतनपुर के कन्हारजुनी नामक तालाब के साथ जुड़ती है। कथा में राजा द्वारा आरे से चीर कर आधा अंग दान देने का प्रसंग है। रेखांकन कि पृथु और मयूरध्वज की इन दोनों कथाओं का ताल्लुक छत्तीसगढ़ से है।

मयूरध्वज की कथा का असर यहां डेढ़ सौ साल पुराने इतिहास में देखा जा सकता है। पहले बंदोबस्त अधिकारी मि. चीजम ने दर्ज किया है कि अंचल में लगभग निषिद्ध आरे का प्रचलन मराठा शासक बिम्बाजी भोंसले के काल से हुआ और तब तक की पुरानी इमारतों में लकड़ी की धरन, बसूले से चौपहल कर इस्तेमाल हुई है। परम्परा में अब तक बस्तर के प्रसिद्ध दशहरे के लिए रथ निर्माण में केवल बसूले का प्रयोग किया जाता है। अंचल में आरे का प्रयोग और आरा चलाने वाले पेशेवर को, लकड़ी का सामान्य काम करने वाले को बढ़ई से अलग कर, 'अंरकसहा' नाम दिया गया है और निकट अतीत तक आवश्यमकता के कारण, उनकी पूछ-परख तो थी, लेकिन समाज में उनका स्थान सम्मानजनक नहीं था। 

कपोल-कल्पना लगने वाली कथा में संभवतः यह दृष्टि है कि आरे का निषेध वन-पर्यावरण की रक्षा का सर्वप्रमुख कारण होता है। टंगिया और बसूले से दैनंदिन आवश्ययकता-पूर्ति हो जाती है, लेकिन आरा वनों के असंतुलित दोहन और अक्सर अंधाधुंध कटाई का साधन बनने लगता है। यह कथा छत्तीसगढ़ में पर्यावरण चेतना के बीज के रूप में भी देखी जा सकती है।

सोनझरा की परंपरा और पृथु, मयूरध्वज की कथाभूमि छत्तीसगढ़, स्वर्ण नीलामी वाला पहला राज्य है। पहल करने में श्रेय होता है तो लीक तय करने का अनकहा दायित्व भी। इन कथा-परंपराओं के बीच सुनहरे सच की पतली सी लीक है- सस्टेनेबल डेवलपमेंट (संवहनीय सह्‌य या संपोषणीय विकास) की, जिसकी अवधारणा और सजगता यहां प्राचीन काल से सतत रही है। हमने परंपरा में प्राकृतिक संसाधनों के दोहन को आवश्यक माना है लेकिन इसके साथ ''समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे॥'' भूमि पर पैर रखते हुए, पाद-स्पर्श के लिए क्षमा मांगते हैं। अब सोने की खान नीलामी के बाद उत्पादन का दौर शुरू होने के साथ याद रखना होगा कि संसाधन-दोहन का नियमन-संतुलन आवश्यक है, क्योंकि मौन और सहनशील परिवेश ही इस लाभ और विकास का पहला-सच्चा हकदार है, लाभांश के बंटवारे में उसका समावेश कर उसका सम्मान बनाए रखना होगा और यही इस नीलामी की सच्ची सफलता होगी।

पुछल्‍ला- सोनाखान के साथ वीर नारायणसिंह, बार-नवापारा, तुरतुरिया, गुरु घासीदास और गिरौदपुरी, महानदी-शिवनाथ और जोंक की त्रिवेणी को तो जोड़ना ही चाहता था, विनोद कुमार शुक्‍ल के 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' की सोना छानती बूढ़ी अम्‍मां भी याद आ रही है और छत्‍तीसगढ़ की पड़ोसी सुवर्णरेखा नदी भी। लेकिन इन सब को जोड़ कर बात कहने की कोशिश में अलग कहानी बनने लगी, इसलिए फिलहाल बस यहीं तक।

Wednesday, September 9, 2015

बनारसी मन-के

एक समय था, जब कस्बे से कोई शहर जाता, खासकर लंबी दूरी पर, तो इसकी खबर सब को हो जाती और लोगों की फरमाइश आने लगती कि उनके लिए शहर से क्या‍ लाना है, और यह न सिर्फ सम्मान देने का ढंग होता, बल्कि लगभग अनिवार्य औपचारिकता भी होती कि पूछा जाए- आपके लिए क्या‍ लाना हैॽ (न कि आपके लिए कुछ लाना हैॽ) इसी क्रम में मेरे बनारस जाने की खबर सुन कर हमारे एक रिश्तेदार ने कह दिया कि उन्हें हल्दी की माला चाहिए। काम एकदम आसान था, विश्वनाथ गली जाना ही है, किसी पहली दुकान से माला खरीद लूंगा और हल्दी की माला..., कीमत क्या होगी, दो-पांच रुपए। बनारस पहुंचकर विश्वनाथ गली का पहला ही दिन था, सोचा काम निबटा लूं, दुकानदार से पूछा- माला, हल्दी कीॽ दुकानदार ने सपाट जवाब दिया, नहीं। मैंने ध्यान नहीं दिया, एकाध जगह और पूछा, माला नहीं मिली तो घूमते-फिरते आगे निकल गया, सोचा फिर किसी दिन।

यही सब अगले दिनों में बार-बार हुआ, किसी दुकानदार से दुबारा भी टकराया, उसने जरा चिढ़कर कहा, बताया तो, नहीं है, अब मेरा ध्यान गया कि दुकानदारों का जवाब सामान्य नहीं होता, वे अजीब नजरों से घूरते हुए जवाब देते हैं, कभी चिढ़े से, मैं ठीक समझ न सका, कि क्या हो रहा है। मैं गली से गुजरता, तो माला दुकान वाले मुझे जिस नजर से घूरते उससे लगता, सब को खबर है कि मैं हल्दी माला वाला वही ‘अजूबा’ ग्राहक हूं। समझ में आया कि जो दुकानदार नजरअंदाज कर गुजरते को आवाज देकर बुलाते हैं उनसे नजर मिलने पर भी आमंत्रण नहीं मिलता, यूं ही राह चलते पूछ लेने के बजाय मैं खबरदार सा गुजरता। आसान लगने वाली वह फरमाइशी माला, अब मुसीबत गले पड़ने सी लगने लगी तो यह मेरे लिए खरीद से ज्यादा खोज की चीज बन गई।

ढुंढिराज गणेश से ज्ञानवापी की ओर आगे बढ़ने पर दाहिने हाथ एक दुकान है, जिसके लिए मैं आश्वस्त था कि वहां अब तक नहीं पूछा है, उस दिन पूरी सावधानी से मैंने बुजुर्ग दुकानदार से संभलकर बात छेड़ी, माला चाहिए, फिर कुछ पल चुप रहा, उसने मेरी ओर ध्यान से देखा और पूछा, हल्दी की, पहले तो लगा कि मन वांछित मिल गया फिर मैं सहम सा गया, उसे कैसे पता, उसने बात पूरी की, तुम्हीं हल्दी की माला के ग्राहक हो, मैं सन्न... पूरी गली में शायद बात फैली थी कि कोई हल्दी की माला खोज रहा है। मैं दुकान के पाटे पर गुंजाइश बना कर बैठ ही गया।

दुकानदार ने पूछा, तुम्हें क्यों चाहिएॽ क्या करोगे इसकाॽ मैं आश्वस्त कि अब सही ठिकाना मिल गया, यह अपना माल खपाएगा ही, मैंने तन कर जवाब दिया, कितने की होगीॽ लेकिन उसने फिर अपनी बात दुहराई, उसकी गंभीरता से मैं जरा ढीला पड़ा और बताया कि मैं बाहर से आया हूं, किसी ने कहा कि बनारस जा रहे हो तो वहां से हल्दी की माला ले आना, वहीं सही चीज मिलेगी। मैंने यह बता कर दुकानदार का विश्वास जीता और उकसाने की कोशिश की विश्वनाथ गली की कितनी ही दुकानें, लेकिन यह कहीं नहीं मिल रही, जानना चाहा कि माजरा क्या है, मामूली सी हल्दी की माला की खरीद और यह झमेला।

धीरे-धीरे बात आगे बढ़ी। ठेठ बनारसी (वैसे बनारसी के साथ ठेठ, विशेषण के दुहराव जैसा है) तमीज वाला शास्त्रीय ज्ञान। आपको दिलचस्पी दिखाने की देर है, गुण-ग्राहक पाकर बनारसी अपना काम छोड़कर..., किताब, मिठाई और बनारसी साड़ी दुकानदारों की तो बात ही नहीं, लस्सी वाला दही जमाने की सावधानियों और तरीके, पान दुकान वाला, कत्था-चूना तैयार करने और मगही पत्ते को सहेजने की विधि तो रिक्शे वाला काशी के नये-पुराने भूगोल और ठौर-ठिकानों की सूचना, गूगल वाली सपाट नहीं, बल्कि अपने खास इन-पुट सहित वाली जानकारियों से लबालब कर सकता है। सहज शास्त्र धारित-आभूषित लोक, लोक विराजित शास्त्र।

यूनिवर्सिटी गेट से लंका चौमुहानी की ओर बढ़ते हुए पहलवान लस्सी की गली के दोनों ओर हिस्‍से वाली दुकान। गली में दोनों ओर चौकोर स्तंभों में से दाहिने वाले पर मटमैली सी संगमरमर पट्टिका लगी होती थी, जिस पर आद्याक्षर-हस्ताक्षर वाले तीन अक्षर म.मो.मा. खुदे थे, किसी बैठे ठाले ने इन अक्षरों को मदन मोहन मालवीय बताते मेरे लिए कई रहस्य खोले। इसी के आगे एक खास दुकान होती थी, टिकठी-गोटेदार चुनरी सजी। पहले-पहल ध्यान जाने पर कभी वहां ठिठका था। अंतिम संस्कार की सजी दुकान, बस एक मुरदे की कमी। ‘मौत और ग्राहक का कोई भरोसा नहीं, कब आ जाए’, लेकिन यहां तो ग्राहक आएगा किसी मौत के साथ, मौत का ही भरोसा। मेरे मन में ‘किं आश्चर्यम्’। ठलुए दुकानदार ने मेरी निगाहें पढ़ लीं और फिर दुकान-सरंजाम, संस्कार, मुमुक्षु भवन, जीवन-मरण का सफर कहां-कहां से यहां तक, हरिश्चन्द्र-मणिकर्णिका, वरुणा से अस्सी के बीच की काशी का महात्‍म्‍य और उसका अविस्मरणीय पाठ पढ़ाया, अब उसका यही याद/असर रहा कि बनारस ‘इन्टेलेक्चुअल्स’ की हो न हो, शास्त्रियों की नगरी है।... अटके-भटके-बहके बिना कैसा बनारस ...

बहरहाल, यह दुकानदार पूरे माला-शास्त्री निकले। कितने तरह की माला, किस काम की, कैसे बनती है, ग्राहक कैसे-कैसे, फिर आए हल्दी की माला पर, बताया कि वह इस तरह दुकानों में नहीं मिल जाती, जिसे जरूरत होती है वह खुद या उसका अपना कोई खास ही इसे बनाता है। इसका भारी विधि-विधान है और फिर यह भी कहा कि इसका उपयोग मारण मंत्र सिद्धि के लिए होता है और यदि बनाने में चूक हुई तो खुद के जान पर बन आती है।

मैं सन्न... फिर उसने आगे कहा कि एक बड़े राजनेता के लिए मारण मंत्र का प्रयोग किया गया था, पीताम्‍बरा पीठ, दतिया में और उसके लिए हल्दी की माला बनारस से बन कर गई थी। मैं इस तिलस्म में डूबता-उतराता रहा, वापस आ कर उन रिश्तेदार से दुकानदार वाला सवाल दुहराया, उन्होंने जवाब दिया कि वे पीताम्बरा देवी के भक्त हैं, माला देवी के लिए चाहिए थी, नहीं मिली..., कोई बात नहीं...।

हल्दी माला की इस खोज का हासिलॽ यों तो आनंद पहेली सुलझ जाने का ही होता है, लेकिन कभी बात की बात पहेली बन जाए और वह भी कई परतों वाली, तो उसे जस के तस सहेजे रखना भी मन का मनका सी जमा-पूंजी है।

शीर्षक ‘बनारसी मन-के’ शब्द, छत्तीसगढ़ी मन में आए तो आशय ध्वनित होगा- ‘बनारस के लोगों का’।

Saturday, August 22, 2015

राजा फोकलवा


'राजा फोकलवा', नाटक के केन्द्रीय पात्र फोकलवा के राजा बन जाने की कहानी है। पूरे नाटकीय पेंचो-खम के साथ इस लोक कथा का प्रवाह महाकाव्यीय परिणिति तक पहुंचता है। फोकलवा अलमस्त, बेलाग और फक्कड़ है, दीन बेबस-सी लेकिन ममतामयी, स्वाभिमानी मां का इकलौता सहारा। इस चरित्र में राजसी लक्षण आरंभ से हैं, नेतृत्व, चुनौतियों का सामना करने का साहस, अपने निर्णय के क्रियान्वयन की इच्छा-शक्ति और उसके बालहठ में राजहठ की आहट भी। उसमें कुटिल चतुराई है तो बालमन की नादानी और निर्भीकता के साथ खुद को धार में झोंक देने का दुस्साहसी आत्मविश्वास भी। आम इंसानी कमी-खूबियों वाले इस चरित्र में विसंगत ट्रिगर होने वाला व्यवहार, कहानी में नाटक के रंग भरता है और यह चरित्र आत्मीय न बन पाने के बावजूद दर्शक की सहानुभूति नहीं खोता।

एक दिव्य सुंदर साड़ी और आभूषण- 'तोड़ा' जोड़े के प्रपंच में बार-बार नाटकीय मोड़ बांधे रखता है, दर्शक जैसे ही राग-विभोर होता है, 'सीन' में डूबता है, लय बदल जाती है। मधुरता कैसी और कितनी भी हो, देर तक बने रहने पर एकरसता बन जाती है। कहा जा सकता है कि कहानी में 'हू मूव्ड' वाले 'चीज' का ध्यान रखना, नाटककार के लिए भी अच्छा होता है। नाटक में अप्रत्याशित मोड़, बार-बार चमत्कृत करता है, रिमोट से चैनल-बदल के इस दौर की शायद एक आवश्यकता यह भी है, लेकिन पिछले प्रिय के छूट जाने पर नया बेहतर पाने की चाह दर्शक में जगाना और इस चाहत को पूरा कर पाना, नाटककार के लिए चुनौती होती है और यहां इसे बखूबी निभा लिया गया है।

अभिनेता की सब से बड़ी सफलता है, यदि लगे कि नाटक का चरित्र, उसे देख कर गढ़ा गया है, नायक हेमंत का 'अभिनय' इतना ही स्वाभाविक होता है, कि लगता है, वह इस पात्र से अलग कुछ हो ही नहीं सकता। यवनिका पात पर लगभग प्रत्येक दर्शक प्रशंसा भाव सहित फोकलवा को मंच-परे, उसकी वास्तविकता में देखना, देखे पर विश्वापस-अविश्वास के द्वंद्व से उबरना चाहता है। इस चरित्र में नाचा के जोक्कड़ की छाप तो है ही, लेकिन यह हंसाने वाला विदूषक-मात्र नहीं, जिम्मेदार व्यंगकार जैसा भी है। छत्तीसगढ़ी की पहली और उस पूरे दौर की सबसे लोकप्रिय वीडियो फिल्म राकेश तिवारी की ही 'लेड़गा ममा' के नायक की झलक भी इस फोकलवा में है। पारंपरिक लोक-नाट्‌य के कलाकारों की सहजता, प्रत्युत्पन्न-मति और प्रतिभा, नाटक में सहज प्रवाहित है। वैसे भी आरंभिक मंचनों में इस नाटक की व्यवस्थित और पूरी लिखित कोई स्क्रिप्ट नहीं थी, शायद अब भी नहीं है, इससे नाटक की अनगढ़ता कभी इसकी कमजोरी लगती है तो कभी मजबूती और इसी से यह संभव होता है कि लगभग एक घंटे के इस नाटक की अवधि घटाई-बढ़ाई जा कर आसानी से आधी-दूनी हो जाती है।

गीत-संगीत, नाटक का प्रबल पक्ष है। पारंपरिक धुनों और गीतों का बेहतरीन इस्तेमाल हुआ है। परम्परानुकूल गणेश-वंदना के साथ करमा, ददरिया, बिहाव-भड़ौनी, राउत, देवार गीतों का प्रसंगानुकूल संयोजन, एक ओर दृश्य-स्थापन में सहायक होता है, नाटक को गति देता है, वहीं छत्तीसगढ़ की समृद्ध सांस्कृतिक परम्परा की झलक भी दे देता है। 'फोकलवा के फो फो' शीर्षक गीत मन में बस जाने वाला है और नाटक पूरा होने के बाद भी कानों में गूंजता रहता है। यह सब इसीलिए संभव हुआ है कि लोककथा पर आधारित इस नाटक का लेखन, गीत, संगीत, गायन, निर्देशन एक ही व्यक्ति का है।

नाटक की भाषा की बात करें तो इस छत्तीसगढ़ी नाटक का प्रदर्शन दिल्ली में कुछ विदेशी दर्शकों के सामने हुआ, कलकत्ता के पास धुर बंगला दर्शकों ने भी इसे देखा और अन्य भाषा-भाषियों ने भी, लेकिन नाटक पूरा होने के बाद की प्रतिक्रिया ने हर बार तय किया कि इस नाटक की छत्तीसगढ़ी, अन्य को भी सहज ग्राह्य है। इस नाटक के किसी प्रदर्शन में मेरे साथ एक दर्शक, छत्तीसगढ़ी-अपरिचित, ठेठ हिन्दीभाषी थे, उन्होंने इस नाटक का पूरा आनंद उठाया। दो-तीन महीने बाद छत्तीसगढ़ी के सुगम-सुबोध होने की बात पर वे असहमत हुए तो मैंने राजा फोकलवा का जिक्र किया, उन्होंने याद करते हुए मानों खुद से सवाल किया- अच्छा, वह नाटक छत्तीसगढ़ी में था। इस संदर्भ में स्वाभाविक ही नया थियेटर और हबीब तनवीर याद आते हैं। नाचा शैली के उनके कई छत्तीसगढ़ी नाटकों ने भाषाई हर सीमा लांघते हुए देश-विदेश में धूम मचाई थी। यह भी उल्लेखनीय है कि इस नाटक के शुरुआती दौर में अपने रायपुर प्रवास के दौरान हबीब जी ने एक विशेष आयोजन में इसे देख कर, निर्देशक राकेश और नायक हेमंत की पीठ थपथपाई, आंखों में प्रशंसा-भाव की चमक थी लेकिन लगा कि उनके मन में है- काश, यह मैं खेलता।

यह कृति तिवारी जी की बहुमुखी प्रतिभा का सक्षम प्रतिनिधि है। इसकी कहानी मैंने पहले-पहल उन्हीं से सुनी थी और जब उन्होंने बताया कि वे इसे नाटक रूप देने वाले हैं, उनकी प्रतिभा का कायल होने के बावजूद, तब यह मुझे असंभव लगा था, लेकिन नाटक की पहली प्रस्तुति देखने के बाद मेरे लिए तय करना मुश्किल हो गया कि वे बेहतर नाटककार हैं या किस्सागो। संगीतकार, गीतकार, गायक या निर्देशक। इसके बाद मैंने इसकी दसियों प्रस्तुतियां देखी हैं, हर बार उतनी ही जिज्ञासा और रोमांच के साथ। राजा फोकलवा की सौवीं प्रस्तुति होने वाली है, इस मौके पर अब बस इतना कि इसकी शतकीय प्रस्तुति को तो देखना ही चाहूंगा और शायद आगे भी सौ बार देखना मेरे लिए अधिक न होगा।

टीप- 'राजा फोकलवा' नाटक का 100 वां मंचन, महंत घासीदास संग्रहालय परिसर, रायपुर में आज 22 अगस्‍त 2015 को. इस अवसर पर प्रकाशित स्‍मारिका में मेरा लेख.