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Thursday, January 10, 2013

अनूठा छत्तीसगढ़

प्राचीन दक्षिण कोसल, वर्तमान छत्तीसगढ़ एवं उससे संलग्न क्षेत्र के गौरवपूर्ण इतिहास का प्रथम चरण है- प्रागैतिहासिक सभ्यता के रोचक पाषाण-खंड, जो वस्तुतः तत्कालीन जीवन-चर्या के महत्वपूर्ण उपकरण थे। लगभग इसी काल में यानि तीस-पैंतीस हजार वर्ष पूर्व, बर्बर मानव में से किसी एक ने अपने निवास- कन्दरा की भित्ति पर रंग ड़ूबी कूंची फेर कर, अपने कला-रुझान का प्रमाण दर्ज किया। मानव-संस्कृति की निरंतर विकासशील यह धारा ऐतिहासिक काल में स्थापत्य के विशिष्ट उदाहरण- मंदिर एवं प्रतिमा, सिक्के, अभिलेख आदि में व्यक्त हुई है। विभिन्न राजवंशों की महत्वाकांक्षा व कलाप्रियता से इस क्षेत्र में सांस्कृतिक तथा राजनैतिक इतिहास का स्वर्ण युग घटित हुआ और छत्तीसगढ़ का धरोहर सम्पन्न क्षेत्र, पुरातात्विक महत्व के विशिष्ट केन्द्र के रूप में जाना गया।

खोज और अध्ययन के विभिन्न प्रयासों के फलस्वरूप यह क्षेत्र, पुरातत्व की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। शैलाश्रयवासी आदि-मानव के प्रमाण, रायगढ़ के सिंघनपुर व कबरा पहाड़ और कोरिया के घोड़सार और कोहबउर में ज्ञात हैं। ऐसे ही प्रमाण राजनांदगांव, बस्तर और रायगढ़ अंचल के अन्य स्थलों में भी हैं। लौहयुग के अवशेषों की दृष्टि से धमतरी-बालोद मार्ग के विभिन्न स्थल यथा- धनोरा, सोरर, मुजगहन, करकाभाट, करहीभदर, चिरचारी और धमतरी जिले के ही लीलर, अरोद आदि में सैकड़ों की संख्‍या में महापाषाणीय स्मारक- शवाधान हैं।

इतिहास-पूर्व युग को इतिहास से सम्बद्ध करने वाली कड़ी के रूप में इस अंचल के परिखायुक्त मिट्‌टी के गढ़ों का विशेष महत्व है। ऐसी विलक्षण संरचना वाले विभिन्‍न आकार-प्रकार के गढ़ों को महाजनपदीय काल के पूर्व का माना गया है। जांजगीर-चांपा जिले में ही ऐसे गढ़ों की गिनती छत्तीस पार कर जाती है, इनमें मल्हार का गढ़ सर्वाधिक महत्व का है। इन गढ़ों के विस्तृत अध्ययन से इनका वास्तविक महत्व उजागर होगा, किन्तु प्रदेश की पुरातात्विक विशिष्टता में मिट्‌टी के गढ़ों का स्थान निसंदेह महत्वपूर्ण है।

प्रदेश की विशिष्ट पुरातात्विक उपलब्धियों में नन्द-मौर्य के पूर्व काल से संबंधित आहत-मुद्राएं बड़ी संख्‍या में तारापुर और ठठारी से प्राप्त हैं। मौर्य व उनके परवर्ती काल का महत्वपूर्ण स्थान सरगुजा जिले की रामगढ़ पहाड़ी पर निर्मित शिलोत्खात, अभिलिखित गुफा है, जो सुतनुका देवदासी और उसके प्रेमी देवदीन नामक रूपदक्ष के अभिलेख सहित, प्राचीनतम रंगमंडप के रूप में प्रतिष्ठित है। सातवाहनकालीन इतिहास साक्ष्यों में जांजगीर-चांपा जिले का किरारी काष्ठ-स्तंभलेख इस अंचल की विशिष्ट उपलब्धि है, जो काष्ठ पर उत्कीर्ण प्राचीनतम अभिलेख माना गया है। लगभग इसी काल के दो अन्य महत्वपूर्ण अभिलेखों में मल्हार की प्राचीनतम विष्णु प्रतिमा, जिस पर प्रतिमा निर्माण हेतु दान का उल्लेख उत्कीर्ण है तथा अन्य अभिलेख, सक्ती के निकट ऋषभतीर्थ-गुंजी के चट्‌टान-लेख जिसमें सहस्र गौ दानों के विवरण सहित, कुमारवरदत्तश्री नामोल्लेख है। इसी काल के स्थानीय मघवंशी शासकों के सिक्के और रोमन सिक्कों की प्राप्ति उल्लेखनीय है।

गुप्त शासकों के समकालीन छत्तीसगढ़ में शूरा अथवा राजर्षितुल्य कुल तथा मेकल के पाण्डु वंश की जानकारी प्राप्त होती है। इसमें राजर्षितुल्य कुल का एकमात्र ताम्रपत्र आरंग से प्राप्त हुआ है। इसके पश्चात्‌ का काल क्षेत्रीय राजवंश- शरभपुरीय अथवा अमरार्यकुल से सम्बद्ध है। इस काल- लगभग पांचवीं-छठी सदी ईस्वी के ताला के दो शिव मंदिर तथा रूद्र शिव की प्रतिमा तत्कालीन शिल्‍प के अनूठे उदाहरण हैं। इसी राजवंश के प्रसन्नमात्र व अन्‍य शासक के उभारदार ठप्‍पांकित सिक्के तकनीक की दृष्टि से अद्वितीय हैं, नल शासकों के उभारदार ठप्‍पांकित सिक्‍के बस्‍तर से मिले हैं। इस कालखंड में राजिम में उपलब्ध शिल्प तथा सिसदेवरी, गिधपुरी, रमईपाट के अवशेष भी उल्लेखनीय हैं। इसी प्रकार बस्तर के गढ़ धनोरा के मंदिर, मूर्तियां और भोंगापाल का बौद्ध चैत्य, भारतीय कला की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।

इसके पश्चात्‌ के सोम-पाण्डुवंशी शासकों के काल में तो मानों छत्तीसगढ़ का स्वर्ण युग घटित हुआ है। ईंटों के मंदिरों में सिरपुर का लक्ष्मण मंदिर, ईंटों के प्राचीन मंदिरों में भारतीय स्थापत्य का सर्वाधिक कलात्मक व सुरक्षित नमूना है। साथ ही पलारी, धोबनी, खरौद के ईंटों के मंदिर तारकानुकृति स्थापत्य योजना वाले, विशिष्ट कोसली शैली के हैं। इसी वंश के महाशिवगुप्त बालार्जुन के सिरपुर से प्राप्त ताम्रपत्रों के नौ सेट की निधि, एक ही शासक की अब तक प्राप्त विशालतम ताम्रलेख निधि है साथ ही तत्कालीन मूर्तिकला का शास्त्रीय और कलात्मक प्रतिमान दर्शनीय है। सरगुजा के डीपाडीह और महेशपुर तो जैसे प्राचीन मंदिरों के नगर हैं।

दसवीं से अठारहवीं सदी ईस्वी तक यह अंचल हैहयवंशी कलचुरियों की रत्नपुर शाखा की विभिन्न गतिविधियों-प्रमाणों से सम्पन्न है। विश्व इतिहास में यह राजवंश सर्वाधिक अवधि तक अबाध शासन का एक उदाहरण है। कलचुरि राजाओं के शिलालेख, ताम्रपत्र, सिक्के, मंदिर व प्रतिमाएं प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुए हैं। संभवतः देश का अन्य कोई क्षेत्र अभिलेख व सिक्कों की विविधता और संख्‍या की दृष्टि से प्राप्तियों में इस क्षेत्र की बराबरी नहीं कर सकता।

पुरातात्विक स्थलों की दृष्टि से प्रसिद्ध ग्राम सिरपुर प्राचीन राजधानी के वैभव प्रमाणयुक्त है ही, मल्हार का भी विशिष्ट स्थान है। इस स्थल के राजनैतिक-प्रशासनिक मुख्‍यालय होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता, किंतु मल्हार व संलग्न ग्रामों- बूढ़ीखार, जैतपुर, नेवारी, चकरबेढ़ा, बेटरी आदि विस्तृत क्षेत्र में लगभग सातवीं-आठवीं ईस्वी पूर्व से आरंभ होकर विविध पुरावशेष- आवासीय व स्थापत्य संरचना, अभिलेख, सिक्के, मनके, मृणमूर्तियां, मिट्‌टी के ठीकरे, मंदिर, मूर्तियां, मुद्रांक जैसी सामग्री निरंतर कालक्रम में प्राप्त हुए हैं।

इस प्रकार अभिलेख, सिक्कों का वैविध्यपूर्ण प्रचुर भण्डार, प्राचीनतम रंगशाला, प्राचीनतम काष्ठ स्तंभलेख, प्राचीनतम विष्णु प्रतिमा, उभारदार सिक्के, ताला आदि स्थलों के मंदिरों का अद्वितीय स्थापत्य, मूर्तिशिल्प और पुरातात्विक स्थलों की संख्‍या और विशिष्टता आदि के कारण देश के पुरातत्व में छत्तीसगढ़ का स्थान गौरवशाली और महत्वपूर्ण है।

12 comments:

  1. नि:संदेह पुरात्तव में छत्तीसगढ़ का स्थान गौरवशाली और महत्वपूर्ण है।

    महत्वपूर्ण आलेख के लिए आभार

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  2. आपके इन लेखों का मैं संग्रह कर रहा हूं। यदि आपको आपत्ति ना हो तो? इनकी रोचकता मेरे लिए तब अधिक होती जब इनमें उल्लिखित स्‍थानों में मैं गया होता। आगे के लिए शुभकामनाएं।

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  4. पूज्य श्री राहुल कुमार सिंह जी सचमुच ही अनूठा छत्तीसगढ़ है जहाँ कला , साहित्य, राजवंश, प्रतिमा, सिक्के, अभिलेख, महापाशानीय स्मारक, मिटटी के गढ़ , प्राचीन रंग मंडप, काष्ट पर अंकित अभिलेख, प्राचीन मंदिर, ताम्र पत्र , राज मुद्रा, ताम्र पत्र , दान पत्र , बौद्ध चैत्य, सहित स्थापत्य कला, इसे भारत में ही नहीं विश्व में अनूठा स्थान देता है आपके सानिध्य का लाभ मिला और रूद्र शिव सहित अन्य स्थल के दर्शन लाभ हुए आभारी नहीं जीवन भर ऋणी . संग्रहनीय सदा की भांति।

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  5. सचमुच! अनूठा है छत्तीसगढ़ और अनूठी है इस अनूठे छत्तीसगढ़ की आपके द्वारा की गयी अनूठी प्रस्तुति। शब्द कम पड़ते हैं कुछ कहने को।

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  6. रोचक जानकारी..सुंदर वर्णन।

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  7. लेख पढ़कर मालूम होता है कि बहुत ही समृद्ध रहा होगा कभी यह प्रदेश.
    मेरे विचार में सरकार द्वारा उपेक्षित राज्यों में से एक यह भी है जहाँ के पर्यटन स्थलों को प्रयाप्त बढ़ावा नहीं दिया जाता, उस पर नक्सलियों के भय से भी लोग उस तरफ आने से डरते हैं.

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  8. छत्तीसगढ़ के इतिहास के बारे में जब सोचता हूँ तो पूरे भारत में यही इकलौता राज्य नजर आता है जहाँ की संस्कृति अक्षत रही, जिसने सांस्कृतिक दबाव का वैसा सामना नहीं किया जैसा भारत में अन्य राज्यों को करना पड़ा।

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  9. सांस्कृतिक रूप से धनी इतिहास रहा है छत्तीसगढ़ का।

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  10. सब कुछ किसी परी-कथा जैसा लगता है जिसका आनन्‍द, आपके पास बैठकर बतियाने/सुनने से ही मिल सकता है।

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  11. नमस्ते चाचाजी !

    छत्तीसगढ़ की इतनी सारी जानकारियाँ इस लेख में हैं की दो-तीन बार पढ़ने के बाद ही पूरी तरह लेख आत्मसात कर पा रही हूँ. इन महत्त्वपूर्ण जानकारियों को जानने के बाद अपने राज्य के गौरव को महसूस करना बहुत सुखद है. आपके अन्य अनेक लेखों की तरह इसे भी अपने सिविल समूह में साझा कर रही हूँ ताकि इसे सहेज कर रखूँ और ये जानकारियां सबके काम आये.

    आपका बहुत बहुत धन्यवाद !

    _/\_

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  12. मज़ा आ गया. ऐसी पोस्ट आपसे अपेक्षित थी. महापाषाणीय शव धानों MEIN सराइपाली के निकट स्थित Bartiyabhata बिसर गया.

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