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Tuesday, August 9, 2016

अखबर खान

फक्क गोरिया, कुसुवा मुहां बड़े भारी मुड़ वाला अंगरेज रहंय डांक गाड़ी के ड्रैभल, तोर-हमर जांघ बरोबर तो यंह (दोनों हाथ की तर्जनी और अंगूठे के बीच बित्ते भर का अंतर रखते), ओ कर भुजा रहय, अउ इहां ले छाती भर के लीले फुलपेंट पहिरे रहंय, गेलिस वाला। बेर बुड़तहूं, कभी टेम नइ झुकय, उड़नताल पया मेरा हबरय, तहां चिचियाय, किल्ली पारे बर धर लय, सिवनाथ पुलिया के नाहकत भर ले धडांग खडांग, गुंजा जाय पूरा इलाका।

तओ भइ गे एक दिन अखबर खान ल ताव चढ़ गे, कहिस रहि तो रे अंगरेजवा, ओतका कस के भगाथस गाड़ी ल, धन्न रे तोर पावर, फेर ओ आय तो मसीन के बल म। त मैं देखाहंव तो ल एक दिन। फेर होइस का के चिहुर पर गे पूरा इलाका म। रेस बद देहे हे मालिक ह, ओती डांक गाड़ी अउ एती ओ कर घोड़ी। अउ अपन घोड़ी म सवार मंझनिया ले आ गे पया मेरा। इलाका भर के मन्से सकलाय रहंय, इहां-उहां ले, घुंच देव रे लइका-पिचका मन, झोरसा जाहा, लाग-लुगा दिही। चिहुर मत पारो, खमोस खाओ, सब खबरदार, गाड़ी का टेम हो गया है। ऐ जी, जड़ा रस्ता छोड़के, आस्ते न धिल्लगहा। बस, धक धक धइया, तिहां ले तडांग भडांग। डांक गाड़ी पया ल नहाक ले लिस त एक घरी चुको के अखबर खान के घोड़ी ढिलाइस। गै रे बबा, पछुआही झन। इहां ले उहां, बेल्हा टेसन के हबरत ले सल्लग मन्से। कोइ टाइम नइ लगिस फैसला टुट गे। अखबर खान बेल्हा टेसन के बाहिर म हबर ले लिस, त थिरका दिस अपन घोड़ी ल। अउ लहुट के देखिस जेवनी बाजू ल, इंजिन रहय, नहीं भी त, बीस हांथ पाछू। तओ। अउ का तओ, लुआठ ल चाट ले अंगरेज। ड्रैभल दांत निपोर के हांथ हलाइस, टा टा। अउ अखबर खान घोड़ी के चुंदा ल अंगठी म खजुआत, कोरत रहय।

हं! फेर अंगरेज रहंय बात के सच्चा, कानून के पक्का। कहिस के आज ले अखबर खान के नांव के एक फस्क्लास के डब्बा लगिही डांक गाड़ी में, तिसमें उसका घर परिवार कुटुम, बेडाउस, जब चाहय, जिहां चाहय, जा आ सकत हे। लेकिन कई झन कथें कि तेहि डब्बा खाली रथे त कई बार रेलवाही के बड़े साहब मन सीट नइ पांय त ओइ म लुका के बइठे भी रथें।

मजा आ गे बबा, जोरदार किस्सा। हौ ग, फेर किस्सा नो हय, असली बात आय, सिरतो, ओ कर नांव के डब्बा ह सबूत आय, आज भी। पतियास नहीं त बेलासपुर टेसन म जा के देख लेबे, गाड़ी ठढ़ा होही तओ। हौ, हौ, अउ कस ग, घोड़ी के का नांव रिसे। वह दे, घोड़ी भाई घोड़ी, ते कर का नांव। हं, रेस के थोड़े दिन म गुजर गए रिसे। गजब सुग्घर, सात हांथ के घोड़ी, चिक्कन, फोटो बरोबर। चल जान्धर सुरता नइ आत होही त, आने कहूं ल पूछ लीहंव। अउ काल पूछबे, हमर जंवरिहा तो रुख-राई नइए ग इलाका भर म। त कस ग बबा मन, अउ ए ह कब के बात होही, तइहा के गोठ आय ग। तभो ले कोन सन के। वो दे, चार कच्छा पढ़ का लिस तिहां ले तो ओ कर से गोठियाए के धरम नइए, तइहा के बात ए ग ते जमाना म कहां के सन पाबे, अउ कहां के संबत, हं, फेर लबारी नोहय, पतियाबे तओ।

सरगांव के मालगुजार अकबर खान 11 दिसंबर 1944 को जन्नतनशीं हुए, जिनके नाम पर सरगांव का अकबर खान का बाड़ा, बिलासपुर में अकबर खान की चाल और अमेरीकांपा का टुकड़ा गांव अमेरी अकबरी है, की ऐसी ढेरों कहानियां उस पूरे इलाके में चाव से सुनी-सुनाई जाती हैं, उनके और भी कई किस्से हैं, जैसे- मालगुजार अकबर खान का मुख्तियार खान मालिक रेल की पटरी के उपर सायकिल चलाता था... ... ... हाजी मोहम्मद अकबर खान देवी भक्त थे, उन पर देवी आती थी, उनके पांव में पदुम था, जिसे लात मार देते थे, उसकी बरक्कत होती थी ... ... ... अकबर खान के पास 57000 एकड़ जमीन थी, सरगांव में पथरिया के रास्ते जाने पर दाहिनी ओर 100 एकड़ रकबा वाला एक चक खेत था ... ... ... एक बार शिवरीनारायण मठ वाले ओनहारी का बोरा बिछाते गए तो मुकाबले में मलार के साव ने टक्कर ली धान के बोरे बिछाते गए तब सरगांव के अकबर खान के नगदी पैसा के बोरे बराबरी में बिछाए थे ... ... ... मृत्यु के समय उनके खजाने में सवा दो लाख रुपये नगद और चांदी की एक-एक मन की चालीस सिल्ली थी ... ... ... अकबर खान की मृत्यु बैतलपुर अस्पताल में हुई, वहां आज भी उनकी फोटो लगी है, जो उनकी एकमात्र तस्वीर है।


सीत बावा-देउर, ताला के पुजेरी मूरितदास वैष्णव, खन्तहा के समारू गोंड़ और पंवसरी के मिलउ साहू से सन 1987 में सुनी कहानी, जितनी और जैसे याद रही। 15 अगस्त के आसपास अक्सर याद आती है। इन सुनी-सुनाई की होनी-अनहोनी, मैंने अपने मन का मान जस का तस रखा है।

13 comments:

  1. Had heard directly from u in Hindi. I felt that chhattisgarhi is not so easy. Can we arrange some photographs

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  2. आप हमर बर छत्तीसगढ़ के इनसाइक्लोपीडिया हवव

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  3. जबरजस्त अखबर खान के दन्त कथा ,,,औ ,, भासा के जबरजस्त खेल,,,,किस्सागोई ल लेखनीबद्ध करे के ये मानक उदाहरण है सर,,,,शब्द बोलत हे,,,नवा नवा अरथ,,, बार बार पढ़े ले मजा दुगुना देथे

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  4. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति डेंगू निरोधक दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  5. इस कहानी और इस प्रस्तुतीकरणको पूरी तरह विज़ूअलायज़ कर पाया. आप ने तो फ़िल्म ही दिखा दी।

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